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तान्हाजी फिल्म में एक अहम् किरादर को नही दिखाया गया ,जानिए उसके बारे में !

“आजकल तानाजी चित्रपट में यशवंती छिपकली की चर्चा जोरों पर है, आइये तानाजी उनकी कोंडाणा विजय के पूर्व एवं पश्चात के साथ…. 
ऐसी कई जगह जानकारी मिलती है कि तानाजी माँ भवानी के भक्त थे और उसी वेश में वे कोंडाणा के किलेदार उदयभान सिंह से मिले थे, उदयभान उनकी भक्ति से इतना प्रसन्न हुआ कि उदयभान ने तानाजी को किले में स्वछंद कहि भी घूमने की इजाजत दे दी। तानाजी को एक दिन किले की जानकारी एकत्रित करते समय पता चला कि किले में आने वाली एक रात्री को उत्सव मनाया जाएगा, बस उसी रात्री को कोंडाणा विजय करने की योजना बनाई गई ।
कुछ जगह पर हमले की तारीख 4 फरवरी 1670 तो कुछ जगह 16 फरवरी 1670 बताई जाती है, सिधी चढ़ाई पर बना कोंडाणा किला तिकोना है, और जमीन से करीब 760 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है, इसमें 2 दरवाजे है एक कल्याण दरवाजा दूसरा पुणे दरवाजा, दरवाजों के अलावा किले में घुसना करीब-करीब नामुमकिन है, किले के पश्चिमी छोर पर द्रोणगिरि चट्टान है जो किसी भी दूसरे छोर के मुकाबले उबर-खाबड़ एवं खड़ी है, इस छोर से किले पर चढ़ना नामुमकिन माना जाता था इसलिए वहां सबसे कम सैनिक तैनात थे। तानाजी ने इसी छोर से किले पर चढ़ने की योजना बनाई, वे अपने 300 मावल सैनिको के साथ द्रोणगिरि छोर पर पहुँचे, वहाँ उन्होंने बक्से से चर्चित शिवजी की पालतू छिपकली यशवंती को निकाला, यह मुख्यतः भारतीय उपमहाद्वीप पर पाई जाने वाली छिपकली है, जिसे अंग्रेजी में बंगाल मॉनिटर लीज़र्ट कहा जाता है, महाराष्ट्र में इसे घोरपड़ कहते है, उत्तरभारत में इसे गोह कहा जाता हैं, करीब 5 फिट की यह छिपकली किसी भी सतह पर पकड़ बनाकर रेंग सकती है और कई किलो को वजन उठा सकती है, ऐसी लोकमान्यता है शिवजी ने इन्हें दुर्गम जगहों पर सेंध मारने के लिए ही तैयार किया था। तानाजी ने पहले उसकी आरती उतारी फिर उसकी कमर पर रस्सी बांधकर पर्वत पर चढ़ने के लिए छोड़ दिया, बताते है कुछ दूर चढ़ने के बाद यशवंती लौट आई थी, इसे देख शैलार मामा ने इस मुहिम को रोकने का आग्रह किया, लेकिन तानाजी नही माने एवं दूसरे प्रयास में यशवंती द्रोणगिरि पर्वत पर चढ़ गई। इसी यशवंती को लेकर इतिहासकारों में मदभेद है, कुछ इतिहासकारों के मुताबिक यह घोरपाड़ छिपकली थी वही कुछ इतिहासकार मानते है कोंडाणा पर सबसे पहले घोरपाड़ सैनिको की टुकड़ी चढ़ि थी चूंकि महाराष्ट्र में घोरपाड़ सरनेम भी होता है तो इन्ही घोरपाड़ को छिपकली समझ लिया गया घोरपाड़ सैनिको को दुर्गम स्थान पर चढ़ने में महारत हासिल थी, इसी के सहारे तानाजी सबसे पहले ऊपर चढ़े उसके बाद रस्सियों के सहारे कुछ और सैनिक भी ऊपर चढ़े इसी दौरान रस्सी टूट गई और बचे हुए सैनिक नीचे रह गए, चुकी ऊपर चढ़े हुए सैनिको की संख्या कम थी उन्होंने ऊपर चढ़ते ही, गुपचुप मुग़ल सैनिको का वध करना शुरू कर दिया उनकी योजना कल्याण दरवाजा खोलने की थी जिसके पीछे सूर्या जी, तानाजी के छोटे भाई 1 हज़ार सैनिको को लेकर इंतज़ार कर रहे थे। 
हर हर महादेव!का उद्घोष गूँज उठा इसी उद्घोष के साथ मराठों की यह मुट्ठीभर सैनिको की टोली रुद्ररूप धारण कर मुग़ल और अरब सैनिको को काटते हुए कल्याण दरवाजे की और बढ़ती गई, जब तक यह खबर उदयभान तक पहुची तबतक 700 मुग़ल, अरब सैनिको को काट दिया गया, इसे रोकने के लिये उदयभान ने अपने हाथी चन्द्राबली को तानाजी की और छोड़ा कहते है इस हाथी की सूंड को तानाजी ने एक ही वार में काट दिया, जिससे यह हाथी मारा गया, इसके बाद उदयभान ने अपने मुस्लिम सेनापति सिद्दी हिलाल को मराठों को रोकने के लिए भेजा, सिद्दी हिलाल के बारे में प्रचलित है उसने लड़ाई में जाने के पूर्व अपनी 9 बेगमों का सर कलम कर दिया ताकि दुश्मन उसकी बेगमों तक न पहुच पाए। सिद्दी हिलाल ने मोर्चा सम्भालते ही तानाजी को ललकारा आमने सामने हुई इस लड़ाई में तानाजी ने सिद्दी हिलाल को सिर से नाभी तक 2 भागों में चिर दिया, इसके बाद उदयभान ने अपने 12 लड़को को मोर्चा लेने भेजा जिनके तानाजी ने बीच से 2 टुकड़े कर दिए यह समाचार प्राप्त होने पर स्वयं उदयभान मैदान में आया अपने सैनिको, हाथी एवं बेटों को मारने वाले मुट्ठी भर मराठे है यह देख वो पागल हो गया और तानाजी पर टूट पड़ा इसी सँघर्ष में तानाजी की एक बाजू जाती रही, इसी सँघर्ष में उदयभान के साथ लड़ते हुए तानाजी वीरगति को प्राप्त हुए, तबतक मावल सैनिक कल्याण दरवाजा खोल चुके थे। 
हर हर महादेव!के उद्घोष के साथ सूर्या जी एवं शैलार मामा ने सैनिको सहित किले में प्रवेश करते ही उदयभान का वध कर दिया, इसके बाद वहां सिर्फ और सिर्फ कत्लेआम हुआ मुग़ल संख्या में मराठों से 5 गुना थे उनकी लाशों से कोंडाणा का किला पट गया। हर तरफ हर हर महादेव का उद्घोष होने लगा, हजारों मुग़ल, अरब सैनिक काट दिए गए कुछ जान बचाने के लिए किलो से नीचे कूद मरे, आखिरकार किले पर लहराता मुग़ल झंडा उतार दिया गया, अब कोंडाणा मराठों का था और उस पर परम् पवित्र भगवा लहरा रहा था, किले पर कब्जा होने के बाद किले से तोप के गोले दागे गए, और किले पर बनी फुस की झोपड़ियों में आग लगा दी गई यह संदेश रायगढ़ में शिवाजी के लिए था कि कोंडाणा जीत लिया गया है, इसे समझते ही शिवाजी सैनिको सहित ढलान वाले रास्ते से कोंडाणा किले पर पहुँचे अब हर हर महादेव के उद्घोष से जमीन थर्राने लगी, यहाँ पर शिवाजी का हर हर महादेव के उद्घोष के साथ स्वागत कर सैनिको ने उन्हें घेर लिया एवं बधाई दी, जब शिवाजी आगे बढ़े तो उन्हें तानाजी की देह दिखी यह देख शिवाजी ने सबको शांत किया एवं तानाजी की देह की और दौड़ पड़े, बड़े कष्ट से उनके मुंह से यह शब्द निकले थे “गढ़ आला पण सिंह गेला” गढ़ जीत लिया परन्तु सिंह को खो दिया, इस तरह तानाजी ने राजमाता जीजाबाई साहेब को दिया अपना वचन पूर्ण किया।


तानाजी के सम्मान में इस किले का नाम बदलकर सिंघाड़ किला रख दिया गया, सिंघाड़ याने सिंह का गढ़ 1670 में हाथ आया सिंघाड़ 1689 तक मराठों के हाथों में रहा। 1689 में शिवाजी के पुत्र छत्रपति शम्भाजी राजे की हत्या के बाद यह किला पुनः मुगलों के अधीन हो गया था, परन्तु यह किला आज भी सिंघाड़ के नाम से जाना जाता हैं। यह 1670 कि लड़ाई ही थी जिसने दक्षिण में मराठों की नियति निर्धारित की थी, यह तानाजी ही थे जिनके अदम्य साहस पराक्रम और बलिदान ने शिवाजी के वंश स्थापना के लिए ईंधन दिया था। 6 जून 1674 में छत्रपति की उपाधि धारण करने के बाद शिवाजी ने 1676 में तानाजी की सिंघाड़ में समाधि बनवाई गई, उस समय के कवि तुलसीदास जी ने तानाजी पर अनेक पोवाड़े  (गौरव गीत) लिखे। सन 1890 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जी ने रामलाल नन्दराम नाईक से सिंहगढ़ का विश्राम घर खरीदा था, तिलक जी गर्मियों के 2 माह यही बिताते थे, कहते थे इस जगह से उन्हें राष्ट्रवाद की प्रेरणा मिलती है, बातते है तिलक जी ने “द आर्किटेक्ट होम्स इन द वेदास” की रचना यही की थी, एवं ‘गीता रह्स्य” का प्रिंट भी यही तैयार हुआ था। 1915 में जब गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से लौटे थे तब उन्होंने इसी जगह तिलक जी से मुलाकात की थी। नेताजी सुभाष चंद्र बोस भी इसी जगह तिलक जी से मिलने आते थे। 1903 में महाराष्ट्र के प्रख्यात लेखक ने तानाजी पर एक उपन्यास लिखा था उसका शीर्षक था “गढ़ आला पण सिंह गेला” इसी उपन्यास पर प्रसिद्ध फिल्ममेकर व्ही. शांताराम ने “सिंघाड़” नाम से एक मराठी फिल्म बनाई थी। वीर सावरकर ने तानाजी पर एक गाथा गीत लिखा था जिस पर तत्कालीक ब्रिटिश सरकार ने रोक लगा दी थी 24 मई 1946 को यह रोक हटा ली गई। आज के समय में “नेशनल डिफेंस” के जवानों को ट्रेनिंग के लिए इस जगह भेजा जाता है, यहाँ की खड़ी चढ़ाई पर जवानों को हथियारों के साथ खड़ी चढ़ाई करवाई जाती हैं। 10 जुलाई 2012 को मनखुड़ नेवी स्टेशन पर “आईएनएस तानाजी” नाम का बेस डिपो शिप सर्विस में लिया गया था।
तानाजी मालुसारे भारतीय इतिहास के अजेय योद्धा के रूप में सदा अमर रहेंगे।”
tanhaji yashavnti chipakli tanhaji तान्हाजी यशवंती छिपकली

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