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पहले सब आस्था से चलता था अब विज्ञान, से लेकिन जीत तो आस्था की ही होती है

शीतला माता की पूजा का वैज्ञानिक आधार
भारत में ऋतुचर्या में परिवर्तन के अनुसार खान-पान व रहन-सहन को बदलने हेतु उत्सवों का आयोजन आरंभ हुआ। शीतलाष्टमी भी इनमें से एक है। शीतला माता का व्रत व पूजन चैत्र मास के प्रथम पक्ष में होली के 1 सप्ताह बाद आता है l माता का व्रत को करने से दाइ ज्वर, पीत ज्वर, चेचक, दुर्गन्धयुक्त फोड़े, नेत्रों के समस्त रोग, शीतला की फुंसियों के चिन्ह तथा शीतला जनित दोष दूर हो जाते हंी तथा शीतला देवी प्रसन्न होती हैं। स्कंद पुराण में शीतला देवी के स्वरूप का भी वर्णन है कि इनका वाहन गर्दभ है। वे अपने हाथों में कलश, सूप, झाड़ू और नीम के पत्ते धारण करती हैं। इन सभी का प्रतीकात्मक महत्व है। जब चेचक का रोगी व्याकुलता में कपड़े उतारता है तो सूप से दवाई दी जाती है। झाड़ू का अर्थ है कि उसके छूने से चेचक के फोड़े फूट जाते हैं। किन्तु नीम के पत्ते उन्हें सडऩे से बचाते हैं। कलश का महत्व इस बात में है कि चेचक के रोगी को ठंडा जल अच्छा लगता है तो कलश इसी जल का प्रतीक है। गर्दभ की लीद से लेप करने पर चेचक के दाग मिट जाते हैं। शीतला देवी को स्वच्छता की देवी भी माना जाता है। उनके हाथ में झाड़ू सफाई के प्रति जागरूक होने का भी संदेश देता है। इसी प्रकार कलश, समृद्धि के आगमन का भी प्रतीक है।
ऐसी मान्यता है कि चैत्र कृष्ण पक्ष शीतला अष्टमी को माता को बासी भोजन का भोग लगाकर, इसके बाद बासी भोजन पर विराम लग जाता है। ये बासी भोजन करने का ऋतु का अंतिम दिन होता है। इसका तात्पर्य यह है कि ग्रीष्म ऋतु के आने से या मौसम में गर्मी आने से बासी भोजन को कुपथ्य समझना चाहिए। इस व्रत की महिमा इसलिए भी है कि हमारा खान-पान, आचरण शुद्ध, सरल तथा सात्विक हो। अत: यह सात्विकता में निहित सद्िवचारों को प्रचारित करता ऐसा व्रत है जिससे हमें आत्मज्ञान प्राप्त करने का सरल मार्ग प्रशस्त होता है।
गधे पर ही क्यों विराजती हैं माता शीतला… 
संसार में दो प्रकार के प्राणी होते है- पहला, सौर शक्ति प्रधान और दूसरा, चन्द्र शक्ति प्रदान। सौर शक्ति प्रधान जीव बहुत चंचल, चुलबुले, तत्काल बिगड़ उठने वाले और असहनशील होते हैं जबकि चन्द्र शक्ति प्रधान व्यक्ति इससे सर्वथा विपरीत होते हैं। चन्द्र शक्ति प्रधान जीवों में गर्दभ (गधा) प्रमुख है। इसलिए वह ही माता शीतला का वाहन हो सकता है। यहां गधा यह संकेत भी देता है कि चामुण्डा के आक्रमण के समय रोग का अधिक प्रहार सहन करते हुए रोगी को कभी अधीर नहीं होना चाहिए। इसके अतिरिक्त शीतला रोग में गर्दभी का दूध, गधा लोटने के स्थान की मिट्टी और गधों के संपर्क का वातावरण उपयुक्त समझा जाता है। कहते हैं कि ऊंट वाले को कभी पेट का रोग नहीं होता और कुम्हार को चामुण्डा का भय नहीं होता। चामुण्डा शववाहना के अनुसार चामुण्डा का वाहन शव होता है। इसका तात्पर्य यह है कि चामुण्डा से आक्रान्त रोगी को शव की भांति निश्चेष्ट होकर उचित समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए। गदर्भ के इन्हीं गुणों के कारण ही माता शीतला ने उसे अपना वाहन बनाया।

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