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जानिए राष्ट्रिय ध्वज भगवा ध्वज हो इस पर बाबा साहेब के क्या विचार थे

१५ अगस्त १९४७ को अंग्रेजो से भारत की स्वतंत्रता के कुछ दिन पूर्व जब संविधान सभा के बैठके चल रही थी की देश को संविधान की किन किन चीजो की जरूरत लगेगी ,और देश में क्या क्या कानून होने चाहिए तो इस बिच में एक झंडा विषय पर भी बहस का दिन तय किया गया की भारत का झंडा कोण सा होगा ,क्या कांग्रेस का जो झंडा हे वो देश का झंडा होगा इस पर बहस के लिए दिन तय किये गये , जब संविधान सभा शुरूं हुयी तो सबने अपने अपने मत रखे एक ने खा की कांग्रेस का झंडा केसे रख सकते है तो फिर इस बिच में किसीने कहा की देश राम और कृष्ण का हे और देश भगवा ध्वज से ही निकला हे देश ऋषि मुनियों का हे और भगवा त्याग प्रतिक हे इस बहस में तय किया गया की झंडा पर आखरी फेसला २२ जुलाई १९४७ को घोषित किया जायेगा की भारत का राष्ट्रिय ध्वज क्या होगा,

सभा ख़त्म होने का बाद जब देश में चर्चाये चली की सभा में राष्ट्रिय ध्वज को लेकर कई ध्वज पर बात की गयी तो पुरे देश में अलग अलग माहोल था जब वो दिन आया २२ जुलाई १९४७ का तो सुबह से ही संविधान सभा कक्ष के बहार रोड पर लोगो का जमावड़ा लग गया था धीरे धीरे समिति के सदस्य आ रहे थे तब रोड पर हिन्दू महासभा के भी बहुत लोग खड़े थे उसी समय वह पर भीमराव अम्बेडकर जी का आना हुआ तो वे जेसे ही उस भवन की सीडिया चढ़ रहे थे तब हिन्दू महासभा के लोगो ने उनसे खा की बाबा साहब देश का राष्ट्रिय ध्वज भगवा ध्वज हो इसके लिए सभी को सहमत करना तथा देश का ध्वज भगवा ध्वज बने तब बाबा साहब ने उनसे कहा की “में मेरा काम तो कर दूंगा , पर क्या आपके लोग आपका काम करेंगे ” इस बात से वह खड़े लोग आश्चर्य चकित हो गये ,,और हुआ भी वेसा ही राजनेताओ ने बी भगवा ध्वज का विरोध कर ,तिरंगे को मंजूरी दी,उस दिन से भारत का राष्ट्रिय झंडा तिरंगा हो गया

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