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आखिर क्यों संत रविदास जी को सिकंदर लोधी ने केद कर लिया था? कारण जानकर हेरान हो जायेंगे आप

दो मित्र एक पाठशाला में पढ़ते थे…उन दोनो में गहरी मित्रता थी…एक बार बचपन में वे दोनो मित्र लुका-छिपी का खेल खेल रहे थे…पहली बार एक बालक जीता और दूसरी बार उसके मित्र की जीत हुयी। अगली बार फिर पहले बालक की बारी थी लेकिन अंधेरा होने की वजह से वो खेल पूरा नहीं कर सके… तब दोनों ने खेल को अगले दिन प्रात: जारी रखने का निश्चय किया।

अगली सुबह पहला बालक तो खेलने आ गया लेकिन दूसरा बालक नहीं आया… पहला बालक लंबे समय तक इंतजार करता रहा… जब वो नहीं आया तो वह अपने उसी मित्र के घर गया…वहां जाकर देखा कि उसके मित्र के माता-पिता और पड़ोसी रो रहे थे…उसने उनके रोने का कारण पूछा तो उस बालक को पता लगा कि रात को उनके #मित्र_की_मृत्यु_हो_गई…यह खबर सुनकर वह बालक हक्का-बक्का रह गया… उसके बाद उस बालक के पिता जो उन दोनो के गुरु भी थे, ने उस बालक को अपने बेटे के शव के पास पहुंचाया…पास पहुंचने पर उस बालक ने अपने मित्र के शव के पास जाकर उसके कान में कहा कि- “उठो ये सोने का समय नहीं है मित्र… ये तो लुका-छिपी खेलने का समय है…।”

जैसे ही उसने ये कहां उनका मित्र फिर से जी उठा…यह देखकर उस बालक के माता-पिता और पड़ोसी आश्चर्यचकित रह गये।

ये जो पहला बालक था वो #संत_रविदास थे और जो बालक मृत हो गया था वो पंडित शारदानंद के पुत्र थे…जो कि उन दोनो को ही अपनी पाठशाला में पढ़ाते थे…।

संत #रविदास_चर्मकार_समुदाय के थे पर बचपन मे उनको शिक्षा #पंडित_शारदानंद ने दी थी…शारदानंद के पुत्र रविदास के साथ ही शिक्षित हुऐ और उन दोनो मे इतना स्नेह था कि अपने मित्र की अकाल मृत्यु होने पर संत रविदास ने अपने मित्र को आध्यात्मिक शक्ति से पुनर्जीवित कर दिया था…पंडित शारदानंद को बालक रविदास के चेहरे के तेज को देखकर यह महसूस हो गया था कि रविदास कोई सामान्य बालक न होकर ईश्वरीय संतान है…पंडित शारदानंद ने रविदास को अपनी पाठशाला में प्रवेश दिया और उनको प्रारम्भिक शिक्षा दी…।

संत रविदास आगे चलकर संत रामानंद के शिष्य बने… कबीर भी रामानंद के ही शिष्य थे… #कबीर_जुलाहा और रविदास “चर्मकार” दोनो #वंचित_वर्ग से थे जबकि #रामानंद_ब्राह्मणथे…।

संत रामानंद से पाई हुई शिक्षा से ही वे राजस्थान मे सनातन धर्म का प्रचार करने लगे, 
मध्यकाल की महान कवियित्री #मीराबाई_राजपूत थी… जिनके आध्यात्मिक गुरू संत रविदास थे।

धर्म प्रचार के दौरान चित्तोड़ का किला उनका निवास हुआ करता था, तब सिकंदर लोदी ने #सदन_कसाई को रविदास के पास भेजा कि वे मुस्लिम बन जाये…क्योकि उनका समाज पर गहरा प्रभाव था, यदि वे धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम बन जाते तो उनके लाखों अनुयायी भी इस्लाम धर्म में परिवर्तित हो जाते…पर सदन कसाई संत रविदास से इतना प्रभावित हुआ कि वो खुद #सनातन_धर्म_मे_रामदास बनकर शामिल हो गया और हिंदू धर्म का प्रचार करने लगा…तब क्रोधित होकर सिकंदर लोदी ने उन दोनो को बंदी बना लिया, अनेक प्रकार की यातनाऐ दी पर उन्होंने अपना धर्म नही बदला…संत रविदास ने सिकंदर लोदी को जबाव दिया-

” वेद धर्म सबसे बड़ा, अनुपम सच्चा ज्ञान।
फिर मे क्यो छोड़ू इसे, पढ़ लू झूठ कुरान।।
वेद धर्म छोड़ू नही, कोशिश करो हजार।
तिल तिल काटो चाहि, गोदो अंग कटार।।”

बाद में सन्त रविदास की आध्यात्मिक शक्तियों और चमत्कार से भयभीत होकर सिकन्दर लोदी ने उन्हें कारागार से रिहा कर दिया…।

संत रविदास #जीवन_के_आखिरी_क्षण_तक_सनातन_धर्म और निर्गुण भक्तिधारा का प्रचार करते रहें…उन्होंने समाज की तत्कालीन रूढ़ियों का जमकर खंडन अपने साहित्य और वाणी से किया…यद्यपि उस युग में अनेक रूढ़िवादी व्यक्तियों और परम्पराओं ने उन्हें कमतर बताने और खुद को श्रेष्ठ दिखाने की कोशिश की पर वे अपने मार्ग से विचलित नहीं हुऐ…संत रविदास का जीवन बताता हैं कि उस युग में सामाजिक विषमता उतनी व्याप्त नहीं थी जितनी कि आज के तथाकथित कुछ #प्रगतिशील_चिंतक बताते हैं और व्यक्ति उस युग में भी अपने कर्मो और ज्ञान से समाज में सम्मानजनक स्थिति और प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकता था…।
जयंती पर सादर नमन्

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